Sunday, October 2, 2022

सत्संग की जरूरत

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥


संत का मत है की मनुष्य ,भगवान् ब्रह्म की अनुपम कृति, वह इस शरीर रूप मै रह के अध्यात्म के उच्तम स्तर तक पहुंच सकता है | 
जब साधारण मनुष्य का अंत होता है तो वो अपने कर्म अनुसार उसकी आत्मा की नीचे की योनियों मैं प्रवेश मिलता है | उसको पशु,पक्षी, सर्प आदि आदि योनि मैं चला जाता है | 
नीचे की योनियों मैं कष्ट और पीड़ा सेहके उसे पुनः मनुष्य की योनि प्राप्त होती है | मनुष्य शरीर मैं अगर पुनः वो अध्यात्म का अवसर चूक जाता है ,तो उसको पुनः मनुष्य योनि मैं प्रवेश करने मैं बड़ी दिक्कत होती है | 
मनुष्य को सहस्त्र वर्ष लग जाते है मनुष्य योनि मैं लौटते | 


इसीलिए कहाँ गया है की सबसे अच्छा तरीका है इस जन्म -मृत्यु के क्रम से ही वो निकल जाए | उसके लिए सत्संग अपनाने को कहा गया है | अच्छा सत्संग अपनानें मैं उसको एक अच्छे संत या गुरु की जरूरत पड़ती है| आचार्य शंकर ने कहाँ की भगवन बार बार जनम लेके,बार बार मरके ,और बार बार माँ के गर्भ मै आके ,वो बहुत परेशान हो गए है,यह संसार बहुत दुःख दायी है ,हे गोविन्द, कृप्या मुझे इस चक्र से छुटकारा दिलवा दो | मेरी जवान रूपी नाव को ,हे दीनानाथ पार लगा दो | 

संतो का मत है की आत्मा परमात्मा का ही अंश है,
इस मायारुपी दुनिया मै फस जाने के कारण ,इस शरीर पर उस माया का स्थूल या सूक्ष्म आवरण आ जाता है | इस पर्दा आ जाने के कारण, वो इस संसार मैं बहुत परेशान रहता है | 
या पर्दा उसको माया रूपी दुनिया से अलग नहीं होने देता है | इस क्रम मैं वो अपनी असीम शक्ति को खो बैठता है | अतः वो जिस कारण इस मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ, वो लक्ष्य अर्जित नहीं होता है | 

इस परिस्थिति से केवल एक सच्चा गुरु ही आपको निकल सकता है | वो  माया रूपी आवरण को आपके ऊपर से हटा देता है | जो सकती आपके माया रूपी पर्दा मैं दबी हुई है, गुरु उस शक्ति को पुनः जागृत कर देता है | वो आत्मा को परमात्मा के मार्ग तक जाने का रास्ता भी बताता है और अंत मैं आपको परमात्मा से मिला देता है | आप जैसे ही परमात्मा से मिल जाते है, वैसे ही आपको अनन्तः शांति की अनुभूति होती है | 

सद्गुरु की खोज

अगर आपके अंतर मन मै भगवान प्राप्ति का बीज अंकुरित हो गया हैं | 
तो ये भगवान की एक बहुत बड़ी कृपा मानिये | 
भगवान की बहुत बड़ी कृपा होती है तभी आपके अंदर उसको प्राप्त करने की जिज्ञासा बढ़ती है | ये कोई मात्र संयोग नहीं होता है | 
भगवान् प्राप्ति के अनेको उपाय हमारे हिन्दू धर्म की पुस्तकों मै है परन्तु गुरु शिष्य परंपरा का एक अलग ही स्थान है जिसकी गति बाकी सारे उपायों मै सबसे तेज़ बतलायी गयी है | 


गुरु एक पुल की सड़क की तरह होता है जिसका एक छोर मायावी दुनिया मै होता हैं और दूसरा छोर भगवान् से मिलवा देता है | 
मायवी दुनिया मै आप परेशान रहते है | वहां एक अन्धकार होता है | आप उस अन्धकार से प्रकाश की और जाना चाहते है | उसी प्रकाश तक ले जाने मै गुरु आपकी सहायता करता है | 

आपके अंदर अगर गुरु की खोज की लालसा हैं तो इससे आप साधारण प्रक्रिया न समझिये | 
भगवान् ने आपको लाखों लोगों मै से आपको चुना है | 

एक बार आप गुरु के सानिध्य मै आ गए फिर आपको कुछ करने की जरूरत नहीं होती है | आपकी बाकी सारी चिंता गुरु की चिंता हो जाती है | 

अब वो आपका पिता हो जाता है और आपका ख्याल हर क्षण रखता है | 


आप एक सच्चे गुरु से कैसे मिले उसके कुछ संकेत है जो हमारे सत्संग के महापुरषों ने हमें बतलाया है | 

  • जब आपका साक्षात्कार एक सच्चे संत से होता हैं ,तो आप शांति की अनुभूति करते हो | आपको एक अनायास ही आनंद प्राप्त होता हैं | उस व्यक्तित्व के लिए एक आकर्षण होता हैं | 
  • एक सच्चे संत के सानिध्य मै आके आपके मन मै शान्ति और धैर्य जैसे गुण आने लगते हैं | धीरे धीरे सांसारिक वस्तुए जो आपको पहले मोहित करती थी, उनसे आपका दिल लगना काम होने लगता है | आप अपने घर का काम भी करते रहोगे और उसमे कोई विशेष आनंद भी नहीं आएगा | 
  • समय समय पर सच्चे संत आपकी आध्यात्मिक उत्थान हेतु जरूरी सहायता प्रदान करते रहते है | साथ ही मानसिक सत्संग द्वारा निरंतर मार्गदर्शन देते रहते है |  ये एक अनुभव करने योग्य चीज़ है जिसके लिखित मै समझा पाना अंसम्भव है | 
  • आप देखेंगे की सच्चे संत का व्यवहार सबके साथ, चाहे वो उनका पारिवारिक सदस्य हो, या उनका साधक हो,सबके साथ नम्र और विनीत होगा 
  • एक सच्चा संत आपको हमेसा यही परामर्श और शिक्षा देता है की आपको एक सादा और शुद्ध जीवन व्यतीत करना चाहिए | आपको साथ ही ये भी वो शिक्षा देगा की मादक वस्तुओं से दुरी बनाये रखो | 
  • एक सच्चा संत आपको परमात्मा के प्रेम की ऊपर बढ़ने के आतंरिक मार्ग की शिक्षा देता है | 
  • एक सच्चे संत को आपके धन अथवा किसी प्रकार  से लेना देना नहीं होता | इनकी दैनिक दिनचर्चा की पूर्ति प्रकृति द्वारा स्वतः ही हो जाती है | 
  • एक सच्चा संत आपको सांसारिक द्वयत्व एवं अपने माता,पिता ,परिवार ,समाज एवं`संसार की अवहेलना करने को कभी नहीं कहेगा | वो आपको संसार से अलगाव या सन्यास के लिए कभी भी प्रोत्साहित नहीं करेगा |