पुनरपि जननं पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥
संत का मत है की मनुष्य ,भगवान् ब्रह्म की अनुपम कृति, वह इस शरीर रूप मै रह के अध्यात्म के उच्तम स्तर तक पहुंच सकता है |
जब साधारण मनुष्य का अंत होता है तो वो अपने कर्म अनुसार उसकी आत्मा की नीचे की योनियों मैं प्रवेश मिलता है | उसको पशु,पक्षी, सर्प आदि आदि योनि मैं चला जाता है |
नीचे की योनियों मैं कष्ट और पीड़ा सेहके उसे पुनः मनुष्य की योनि प्राप्त होती है | मनुष्य शरीर मैं अगर पुनः वो अध्यात्म का अवसर चूक जाता है ,तो उसको पुनः मनुष्य योनि मैं प्रवेश करने मैं बड़ी दिक्कत होती है |
मनुष्य को सहस्त्र वर्ष लग जाते है मनुष्य योनि मैं लौटते |
इसीलिए कहाँ गया है की सबसे अच्छा तरीका है इस जन्म -मृत्यु के क्रम से ही वो निकल जाए | उसके लिए सत्संग अपनाने को कहा गया है | अच्छा सत्संग अपनानें मैं उसको एक अच्छे संत या गुरु की जरूरत पड़ती है| आचार्य शंकर ने कहाँ की भगवन बार बार जनम लेके,बार बार मरके ,और बार बार माँ के गर्भ मै आके ,वो बहुत परेशान हो गए है,यह संसार बहुत दुःख दायी है ,हे गोविन्द, कृप्या मुझे इस चक्र से छुटकारा दिलवा दो | मेरी जवान रूपी नाव को ,हे दीनानाथ पार लगा दो |
संतो का मत है की आत्मा परमात्मा का ही अंश है,
इस मायारुपी दुनिया मै फस जाने के कारण ,इस शरीर पर उस माया का स्थूल या सूक्ष्म आवरण आ जाता है | इस पर्दा आ जाने के कारण, वो इस संसार मैं बहुत परेशान रहता है |
इस मायारुपी दुनिया मै फस जाने के कारण ,इस शरीर पर उस माया का स्थूल या सूक्ष्म आवरण आ जाता है | इस पर्दा आ जाने के कारण, वो इस संसार मैं बहुत परेशान रहता है |
या पर्दा उसको माया रूपी दुनिया से अलग नहीं होने देता है | इस क्रम मैं वो अपनी असीम शक्ति को खो बैठता है | अतः वो जिस कारण इस मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ, वो लक्ष्य अर्जित नहीं होता है |
इस परिस्थिति से केवल एक सच्चा गुरु ही आपको निकल सकता है | वो माया रूपी आवरण को आपके ऊपर से हटा देता है | जो सकती आपके माया रूपी पर्दा मैं दबी हुई है, गुरु उस शक्ति को पुनः जागृत कर देता है | वो आत्मा को परमात्मा के मार्ग तक जाने का रास्ता भी बताता है और अंत मैं आपको परमात्मा से मिला देता है | आप जैसे ही परमात्मा से मिल जाते है, वैसे ही आपको अनन्तः शांति की अनुभूति होती है |