Tuesday, February 25, 2020

गीता 15:8


शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8।।


जिस प्रकार वायु एक स्थान से दूसरे स्थान पे बहती हुई एक स्थान की खुसबू और  दुर्घन्ध को अपने साथ लेती हुई चलती है उसी प्रकार गन अवगुण लेते हुए ये आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर मैं प्रविष्ट होती है|


श्री कृष्णा यहाँ पुनर्जन्म भी बताते है,उन्होंने कहाँ है जैसा कर्म इस जन्म मैं हमारे द्वारा होगा,वैसा ही शरीर या योनि हम इस जीवन के बाद मिलेगा

भगवान् हनुमान का भगवान् श्री राम को उनके सवाल के उत्तर

एक बार भगवान् राम ने हनुमान से पूछा की हनुमान ये बताओ की तुम कौन हो,कौन हो तुम,बताओ अपना असली रूप मुझे भी बताओ..... मेरे इतने बड़े सेवक हो,मुझे भगवान् मानते हो..... बताओ कौन हो तुम


इसपे भगवान् हनुमान का जवाब सुने लायक था



देह बुद्ध्या तू दासोहं, जीव बुद्ध्या त्वदंसकः |
आत्म बुद्ध्या त्वमेवाहमिति में निश्चिता मतिः ||



भगवान हनुमान बोले की प्रभु देखने का नजरिया होता है
मै अपना और आपका सम्बन्ध नज़रिये से देखता हूँ

प्रभु अगर देह,शरीर की बात की जाए तो प्रभु,आप मेरे स्वामी हो और मै आपका दास
और अगर जीव की दृस्टि से देखा जाए तो आप मालिक हो और मैं  आपका दास हूँ
पर अगर प्रभु अगर आत्मा की दृस्टि यहाँ लायी जाए तो प्रभु जो आप हो,वही मैं हूँ और प्रभु मुझे इस बारे मैं लेश मात्र भी संदेह नहीं है

सनातन हिन्दू धर्म की मनुस्मृति मैं परिभाषा

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।
प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥

सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये ।
प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये ; यही सनातन धर्म है ॥
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