शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।15.8।।
जिस प्रकार वायु एक स्थान से दूसरे स्थान पे बहती हुई एक स्थान की खुसबू और दुर्घन्ध को अपने साथ लेती हुई चलती है उसी प्रकार गन अवगुण लेते हुए ये आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर मैं प्रविष्ट होती है|
श्री कृष्णा यहाँ पुनर्जन्म भी बताते है,उन्होंने कहाँ है जैसा कर्म इस जन्म मैं हमारे द्वारा होगा,वैसा ही शरीर या योनि हम इस जीवन के बाद मिलेगा