जैसे किसी शेर को बिना दाँत के बना दिया जाए
देखिये आपकी वसीयत मैं ६ लोग है ,ठीक
अब मेरी आदत समझिये, आपकी वसीयत की कोई तो मजबूती तो होगी ही न
उस मजबूती के साथ अगर मैं खेला तो ईस्वर मुझे माफ़ नहीं करेगा
और देखा जाए तो वो वसीयत बन गयी है
केवल २ विकल्प
पहला की मैं ये वसीयत को मान जाऊं
दूसरा की मैं न मानू
मैंने दूसरा विकल्प चुनने का फैसला किया
न मैं उसको बेच सकता हूँ , किराये को ६ लोंगो मैं वितरित करना एक धार्मिक जरूरत बना दिया है
तो मैं ऐसे पचड़े मैं हाथ ही क्यों डालूं
जैसे की १.५ करोड़ का ऐसे खर्च किया गया जैसे १००-१५० रुपए हो
भाई मुझसे भी एक बार पूछ लेते , मैं ऐसा पागल भी तो नहीं हूँ
मुझे इंजीनियरिंग के बाद १ साल तैयाररी करनी थी तो मुझे बताया गया की पैसा नहीं है,
मेरी और बीटी की इंजीनियरिंग की पढ़ाई ऐसे करवाई गयी की जैसे सीनियर मैनेजर को कुछ मिलता ही नहीं है , अगर ऑडिट मैं न हो होते तो हम लोग पढ़ ही न पाते
इसी छवि का नतीजा हुआ की मुझे ५ लाख का लोन अपनी शादी मैं लेना पड़ा ताकि जरूरी चीज़ें बिना सोचे समझे हो सके
पर जब आपने अयोध्या का काम अपने रिश्तेदार के कहने से शुरू करवा दिया , और मुझे पागल की भांति भनक तक न लगने दिया, तो मुझे लगा की पैसा तो आपके पास हमेसा से था परन्तु वो पैसा आपका था ,उसमे मेरा तो कोई हक़ ही नहीं था
मैंने सुना है की मेरी माँ एक बार मेरी लड़की से कह रही थी की वो घर केवल तुम्हारा नहीं है, वो हम सबका ही है, जब उस घर के सिलसिले मैं हम अयोध्याजी रहने लगे
ये जिक्र यहाँ इसलिए की वो घर तो अभी तक अपना स्वरुप भी नहीं लिया, न हमने उससे एक भी रुपया कमाया, तब आप सबका सोचना, ये था