इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता: |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च || 2||
हे अर्जुन,जो भी इस पवित्र ज्ञान को धारण करता है,वो मेरी तरह ही परम ब्रह्म हो जाता है|
इस पवित्र ज्ञान को धारण किया व्यक्ति किसी भी परिस्थिति मैं विचलित नहीं होता,न वो सृष्टि की शुरुआत मैं जन्म लेता है
और न ही प्रलय या विपरीत परिस्थिति मै उसका नाश होता है
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