मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् |
सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत || 3||
हे अर्जुन,मेरे प्रारंभिक स्वरुप जिससे परम ब्रह्म स्वरुप भी कहा जाता है ,ये स्वरुप ही सब जीव की उत्पति का कारन है,ये ब्रह्म स्वरुप ही सब जीवो की उत्पति की योनि हैं और मैं उस योनि मैं जीव की उत्पति का बीज स्थापित करता हूँ जिससे सारे जीव की इस पृथ्वी पर उत्पति होती है|
भगवान् श्री कृष्णा ने इस श्लोक मैं अपने आप को सब जीव की उत्पति का कारण माना है,उन्होंने सब को अपना पुत्र बोला और अपने को सम्पूर्ण संसार का पिता बोला है|
प्रभु का ऐसा सम्बोधन होने के बाद भी हम जीव अपने आप को अकेले समझते हैं,जबकि प्रभु तो हम बच्चो पे हमेसा अपनी कृपा बरसाता रहता हैं ,
ये कहना भी काम होगा की हम भगवान् से डरें ,प्रभु हमारी सारी जरूरत का ख्याल रखता है और बदले मै एक भी चीज़ नहीं मांगता हैं,
भगवान् का हमसे वैसा ही रिश्ता है जैसा एक माँ का अपने बच्चे से होता है
जैसे हम गंदे हो तो माँ खुद हमें साफ़ करती है,क्या हमे बोलने की जरूरत पड़ती है माँ से....
वैसे ही प्रभु भी हमारी चिंता,रक्षा ,सुरक्षा ,जरूरतों ,आदि का ध्यान पल पल रखता हैं
वो हम अल्प बुद्धि वाले लोगो को ऐसा लग सकता है की जो हो हो रहा है वो हम कर रहे है परन्तु बिना प्रभु की इच्छा से अपना और न किसी का एक कार्य पूर्ण नहीं होता हैं
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