महात्मा रामचंद्र जी महाराज
महात्मा रामचंद्र जी महाराज का जन्म २ फ़रवरी १८७३(1873 ) को हुआ था.
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ मै हुआ था.
आप की माता जी ने आपके अंदर अध्यात्म का बीज़ बोया।
आप बचपन मै ही भगवान् को पाने का साधन ढूढ़ने लगे |
आप की रूचि संगीत की तरफ भी थी और आप एक सुरीली आवाज़ के धनि थे
आपके पिता जी जमींदार थे
जब आप सात वर्ष के थे , तब आपकी माता जी न निधन हो गया |
आपने अपने अधाय्तम जीवन मैं अपनी अर्द्धनदिनी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना | आप जो सत्य मार्ग पे चले उसका पूरा श्रेय अपनी आराध्य धर्म पत्नी को दिया |
होश सँभालने पर आप स्वामी ब्रह्मानंद जी के पास जाय करते थे और उनके उपदेश सुना करते थे |
स्वामी ब्रह्मानंद जी महराज की उम्र उस समय १५० वर्ष थी |
मकान छोटा होने के कारण आपने अपना नया घर स्वामी के पास ही लेलिए था | वो घर एक मस्जिद के पास था |
आपकी कोठरी के बगल मै एक सिद्ध मौलवी संत रहा करते थे |
एक दिन दफ्तर से काम ख़तम करने मैं आपको समय लग गया और रात काफी हो गयी | लौटते वक़्त तेज़ बारिश होने लगी और सर्दी के दिन चल रहे थे | आपको बहुत ठण्ड लग रही थी| आप जैसे ही अपने कोठरी का दरवाजा खोले तो बगल मैं रहने वाले मौलवी संत ने बोलै की बेटा बहुत देर हो गयी आने मैं |
मौलवी संत के इस मैं एक जादू सा था | वो प्रेम आपने महसूस किया| वो आकर्षण आपका दिल दिमाग हिला दिया |
मौलवी संत ने बोला जाओ कपडे बदल लो और आओ आग जलाया हूँ | आके थोड़ा हाथ पैर सेक लो |
आपने अपना आदाब पेश किया और जैसा उन्होंने बोलै वैसे ही किया |
आप कपडे बदल के मौलवी संत के कमरे मैं दाखिल हुए और आदाब पेश किया |
मौलवी संत से आपकी आँखे मिली तो सिर से लेकर नख तक एक बिजली दौड़ गयी | आपको ऐसा लगा की मानो दो आत्माएं मिल के एक हो गयी है | मौलवी साहब ने कृपा पूर्वक आपको अपने बिस्तर पे लिटा दिया और रजाई ओड़ा दी |
आपको एक अज़ीब आनंद की प्राप्ति हो रही थी | पूरा माहोल मस्ती सा लग रहा था | आप खुद को एकदम हल्का महसूस कर रहे थे | पुरे शरीर मै एक प्रकाश सा लग रहा था |
वर्षा बंद होने के बाद आपने आज्ञा ली और अपने कमरे चल पड़े | हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिख रहा था | पुरे शरीर से ॐ की ध्वनि निकल रही थी |
कमरे पर पहुंच कर आपने खाना भी नहीं खाया और सो गए | रात मै स्वपन मै आपको कई संत महात्माओं के दर्शन हुए और उन सबसे मै आप भी थे |आपने आगे स्वपन मै देखा की एक दिव्या सिंघासन ऊपर से उतर रहा है और वो नीचे आया | उस सिंघासन पर एक दिव्य पुरुष विराजमान है | सब महापुरुष और संत आदर मै खड़े हो गए | मौलवी संत ने आपको उनकी सेवा मैं लगा दिया | उन महापुरुष ने कहा की इस बच्चे का झुकाओ तो शुरू से ही परमात्मा की तरफ है |
सुबह आपने ये स्वपन मौलवी संत को सुनाया | संत ने सुनते ही आँखे बंद कर ली और धयान मग्न हो गए |फिर आँखें खोल कर बोलै की ये स्वपन नहीं सत्य हैं | तुम धन्य हो और तुम्हारी जैसी आत्मा बार बार नहीं आती है | मै तुम्हे बहुत दिन से छुप छुप कर देखता था और मुझे भी ऐसा लग रहा था | तुम्हारी हस्ती जनम से ही परमात्मा की तरफ झुकी हुई है और तुम इस संसार मै दीन-दुखी की सेवा करने आये हो | उनको अन्धकार से प्रकाश की तरफ से चलने आये हो | धन्य हो तुम |
आप मौलवी संत को हमेसा हुज़ूर साहब बोलते थे |
उसके बाद से आप लगातार हुज़ूर साहब से मिलते रहते थे और उनसे लाभान्वित होते रहते थे|
23 january 1986 को हुज़ूर साहब ने आपको अपने शिष्य के रूप मै स्वीकार कर लिया और अपनी सोहबत से लाभान्वित करने लगे |
हुज़ूर साहब ने 11 october 1986 को आपको आचार्य की पदवी से सुशोभित कर दिया|
हुज़ूर साहब ने आपको आदेश दिया ये विद्या का प्रचार प्रसार करना ही तुम्हारा काम है |इसके लिए जितनी तेज़ी से लग्न हो लग जाओ और यथाशक्ति पूर्ण करो |
आपने अपने गुरु महाराज की वाणी का अक्षरश पालन किया और अपने शरीर मै रहते हुए केवल इस मिशन मै लगे रहे |
आपने अपना एक प्रसंग साझा किया था | एक बार हुज़ूर और आप टहलने के लिए निकले थे |आप अपने घर परिवार की समस्या हुज़ूर साहब को बता रहे थे| आप दोनों एक पुलिया पे बैठे | अचानक हुज़ूर साहब भक्ति और प्रेम के आवेश मै आके अपना सीधा हाथ महाराज के कंधे पे रख दिया | हुज़ूर साहब बोले की भाई बहुत भाग्यशाली हो | परम पिता के प्यारे हो | तुमने बहुत सस्ते मै ये अमूल्य नियामत प्राप्त कर ली |
इस कृपा और विद्या का कोई मोल नहीं है |
आपने उस समय का विवरण दिया की हर और प्रकाश ही प्रकाश था | एक अजीब आनंद था हर तरफ | एक आकर्षण था | हर चीज़ जो नज़र मे आ रही थी चाहे वो कोई घर हो, दीवाल हो,सब उस आनंद मैं सराबोर थे | सब उस प्रकाश मैं नाच रहे थे | अजीब मस्ती सब पर छाई हुई थी | ऐसा मालूम होता था की यही प्रकाश सब का जान ,जीवन और लक्ष्य है|
इस दृश्य के बाद हुज़ूर साहब ने बोलै की यही अब तुम्हारा लक्ष्य है | अब तम्हे इसी मैं लय हो जाना चाहिए |मै अब तुम्हारे पीछे रहूँगा और तुम आगे-आगे चलोगे |
आपने इस दिन और समय का विवरण किया की जाते वक़्त तो दुनिया मेरे साथ थी ,चिंताएं मेरे साथ थी ,
परन्तु वापस लौटते समय दुनिया पीछे छूट चुकी थी | सारी चिंताए ख़तम हो चुकी थी | चिंताओं की जगह ईश्वर प्रेम ने ली थी |
आचार्य पदवी देते समय हुज़ूर साहब ने एक जलसा रखा | उस कार्यक्रम मैं सारे धर्म को मानाने वाले संत महात्मा आये | हुज़ूर साहब ने फ़रमाया की मैंने अपने जवान मैं इस बालक को तैयार किया है | आप सभी इसकी जांच परख कर लीजिये और कोई सुझाव हो तो वो भी साझा करिये |
हुज़ूर साहब ने सारे संत महात्मा को ध्यान मै बैठा दिया | हुज़ूर साहब ने महराज जी से बोला बेटा पुत्तूलाल,इन सब साहबान पे तवाज़ो फरमाओ और जिसके जो भी सवाल हो, उसका हल करो | अल्लाह तुम्हे कामयाबी दें |
आपने तवज़्ज़ो देना प्रारम्भ किया|पहले तो सब आनंद महसूस करने लगे | फिर धीरे धीरे सब विचार शून्य होने लगे | फिर अंत मैं शिवाय परमात्मा की याद के अलावा कोई भी ख्याल किसी के दिमाग मै न रहा | न कोई जमीन थी, न कोई आसमान था | बस एक नूर था जो सबकी जान था | उस नूर मैं एक अजीब आकर्षण और प्रेम था | उसमे सब मस्त थे | उस प्रकाश मैं जी चाहता था की शरीर टूट कर आत्मा उस प्रकाश मै समां जाए | आंखों मै आसूं जारी थे | हुज़ूर साहब ने आदेश किया की ध्यान भंग किया जाए |सबने एक सुर से बोला की कमाल हासिल किया है और सत-पद तक रसाई ही नहीं उसमें पूर्ण लय अवस्था भी प्राप्त कर ली है ।
आप सभी धर्मो को मानाने वाले थे| आपके गुरु इस्लाम धर्म के थे | आपने सदा अपने गुरु के आदेश का पालन किया और सारे भक्तों को अपना ज्ञान देते रहे |
आपका मत था की जिस धर्म मै जन्म लिया है, सारे कर्म काण्ड उसी धर्म के अनुसार करते रहना चाहिए |
हालांकि आपके गुरुदेव इस्लाम धर्म के मानाने वाले थे परन्तु आपने हमेशा हिन्दू धर्म का पालन किया |
आपने न कभी रोज़े रखे न कभी नमाज़ अदा की |
आप चित्र या मूर्ति पूजा के विरोधी रहे है | परन्तु कोई जिज्ञासु या भक्त आपकी तस्वीर अपने कमरे मैं रखे तो आपको कोई दिक्कत नहीं थी | आप चरण स्पर्श के भी विरोधी थे परन्तु हिन्दू मान्यता मै अपने पूज्य का चरण स्पर्श करके प्रणाम करना इतना घुल गया था की आपने इसका भी विरोध नहीं किया और कोई भक्त आपके चरण छूना चाहता था तो आपको कोई विशेष विरोध नहीं था |
आप का आध्यात्मिक व्यक्तियों के लिए बहुत आदर था | आप जिस जिस भी संत को जानते,समझते जो आपसे पूर्व मै हुए , उनके लिए, आपके मन मै बहुत आदर था| आप कहा करते थे की हमारी वंस की म्हणता हमारे पूर्व संतो और महा पुरषो के कारण है |
सिद्धि ,शक्ति,तंत्र मंत्र के भी आप ज्ञाता थे, परन्तु आपने इसका विरोध ही किया और कभी भी इसका प्रचार प्रसार का किया न किसी को प्रेरित किया | कोई आपको मज़बूर करता था तो आप ताबीज़ लिख दिया करते थे |
आपको प्रार्थना पे बहुत भरोसा था पर वो कभी अपने लिए प्रार्थना नहीं करते थे और न की कभी सांसारिक लाभ के लिए प्रार्थना करते थे|
प्रार्थना वो थी जो दूसरे के लिए की जाए |
गुरु शिष्य रूपी पवित्र परंपरा के वो पक्षधर थे और कहते थे की हर मनुष्य को गुरु चाहिये परन्तु गुरु बहुत देख भाल के रखने की सलाह दिया करते थे |
आपके गुरु महाराज आपसे बहुत खुश रहते थे और अपना सब कुछ आपको दे दिया था | आशीर्वाद रूप मै उन्होंने कहा था आपकी सात पुष्ट इस सत्संग रूपी क्रिया को सींचेगी और देखने मै आता है की ४ पुष्ट तो देखि जा रही है जो ये सत्संग चला रही है |
देखने मै आया की आपसे कुछ मुसलमानों ने कहा की ये विद्या आपने एक मुसलमान सूफी संत हुज़ूर साहब से ली है तो अब आप भी मुसलमान बन जाइये | ये बात आपने हुज़ूर साहब से बोला की सरकार आपका आदेश हो तो कहिये मै धर्म परिवर्तन करवा लूँ | ये बात सुनते ही हुज़ूर साहब बहुत गुस्सा हुए और उस मुसलमान मुखिया को अपने बाड़े से अलग कर दिया |
हुज़ूर साहब कहा करते थे की संत का कोई धर्म नहीं होता |वो सबका होता है | संत तो खुदा की जाति को ही अपनी जात बना लेता है|
एक प्रसंग आता है आपके जीवन का की आपके सहयोगी ने ब्रह्मानंद आश्रम के निकट पिकनिक का प्लान बनाया और आपको भी जबरदस्ती लेकर चले गए| पहले नाच गाना हुआ और फिर सबसे भांग कुटी और पि| आपने मना किया की आपने हुज़ूर साहब से प्रतिज्ञा ली है की आप नशा से दूर रहेंगे | परन्तु आपके दोस्तों ने आपको पकड़ के जबरदस्ती भांग पीला दी | पिने के बाद आपका चेहरा तमतमा गया और आपका चेहरा प्रकाश मैं बदल गया | आपका चेहरा का नौ नक्श बदलने लगे और दाढ़ी मुछे आने लगी | सब साथी डर गए और खड़े हो गए | इतनी देर मै स्वामी ब्रह्मानंद भी आ गए और सब सहयोगिओं को फटकारा |
लौटते समय रस्ते मै हुज़ूर साहब भी मिल गए | सहयोगियों ने पहचाना की आपका चेहरा एकदम हुज़ूर साहब की तरह बदल गया था |
आप हुज़ूर साहब के साथ टहलने निकल गए और सारा वृतांत आपने उनको सुनाया | हुज़ूर साहब ने बोला की जो लोग परमात्मा पर भरोसा करते है , परमात्मा उनका साथ देने आते ही रहते है |
14 अगस्त सर 1931 ई॰ की सुबह को पूजा वाले कमरे में जहाँ हमेशा संध्या हुआ करती थी, बिना किसी की सहायता के स्वयं पधारे । खाट पर लेट गये और आँखें बन्द कर ली और फिर नहीं खोली और न किसी से बातचीत की । मक्खी वग़ैरा को हाथ से उड़ा देते थे और बस रात के एक बजे ईश्वर की उस अखण्ड ज्योति ने पार्थिव शरीर को छोड़ दिया और अपने असल भण्डार में सदा के लिये विलीन हो गई ।
हम ना मरे, मरा संसार ।
हमको मिला जिलावनहार ।।

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